बुधवार, 11 जनवरी 2017

महाभारत के बाद का आर्यावर्त भाग - 6

महाभारत काल के बाद का आर्यावर्त : भाग - 6

 
महात्मा मुहम्मद भाग-2
 
जिसको आधुनिक काल में ईरान कहते हैं  वहाँ हमारे महर्षि गौतम जी का आश्रम रहा है। उन्होंने वहाँ वेद का बड़ा प्रसार किया था। ईरान से पूर्व उस राष्ट्र का नाम श्वांगनी था। वह आर्यत्व कहलाया जाता था। इसी प्रकार जिस राष्ट्र को आधुनिक काल में अरब रूपों से वर्णन किया जाता है, यह नाम मुहम्मद के द्वारा रूपांतर है, इससे पूर्व अरब का नाम शोनध्ेतु नाम का राज्य कहलाता था। जहाँ महर्षि जैमिनी जी का प्रायः भमण होता था। मुहम्मद के मानने वालों ने इस भारत भूमि पर आक्रमण करना प्रारंभ किया परंतु यहाँ राजा भोज के काल में काली हुए जिन्होंने मुहम्मद को नष्ट कर दिया और मृत्यु को प्राप्त करा दिया। मुहम्मद चाहता था कि यदि इस भारत भूमि पर उसका साम्राज्य हो जाए, प्रभुत्व हो जाए तो सारे संसार को अपनी छत्र-छाया में लाया जा सकता है। राजा भोज के महामंत्री काली ने उन्हें नष्ट कर दिया। आगे समय आया और मुहम्मद के मानने वालों ने इस भारत भूमि पर आक्रमण किया और वह विजयी हो गये, यहाँ उनका साम्राज्य हो गया। उस साम्राज्य में क्या हुआ इस घृणित चर्चा को मैं लाना नहीं चाहता, सूक्ष्म चर्चा यह देना चाहता हूँ कि उनका चरित्र, उनकी मानवता, उनका इतिहास प्रकट करता है कि यदि मुहम्मद के मानने वालों में अराजकता न होती तो उनके यहाँ से जाने का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता थां यवनों ने क्या किया? माता के श्रृंगार का हनन और अपना प्रभुत्व स्थापित करना यह उनका कार्य थां उनके राष्ट्र की परम्परा चली। उनके राज्य में यहाँ कोई ऐसा राजा नहीं हुआ जिसमें पांडित्य हो और जिसने पांडित्य की दृष्टि से राष्ट्र को उन्नत बनाने का प्रयत्न किया हो। रहा यह कि क्यों इतने काल तक उन्होंने यहाँ राज्य किया? तो इसके वही कारण, जो आधुनिक काल में भी प्रायः चल रहे हैं कहीं भाषा का विवाद, कहीं मानवता का विवाद है। अरे! जब समाज में स्वार्थवाद आ जाता है तो प्रायः मानव पराधीन हो ही जाता हैं यदि मानव के द्वारा अपनी संस्कृति हो तो कोई कारण नहीं बन सकता कि हमारे पांडित्य को किसी प्रकार की हानि पहुँचाने के लिए कोई आ पहुँचे।

यहाँ देखो, सबसे पूर्व जो मुहम्मद के मानने वाले थे स्वार्थी व्यक्ति मुहम्मद गौरी को लाये। मुहम्मद की बनाई हुई जो पुस्तक है उसमें केवल एक ही नाद है कि आज जो मुझे स्वीकार न करे उसे नष्ट करो। क्या तुमने इस शब्द को किसी काल में विचारा है। कदापि नहीं विचारते। मुहम्मद ने उन्हें केवल एक ही पाठ दिया। वास्तव में उन्होंने सुधारक कार्य बहुत कुछ किये परंतु एक वाक्य कहा कि जो उसे न माने इसे काफिर और घृणा की दृष्टि से पान करो। इसका विशेष कारण क्या है? विचारों में, धर्म में अधूरापन। जहाँ धर्म में अधूरापन रहता है वहाँ विचार नहीं मिलते। जहाँ विचार नहीं मिलते वहाँ का स्वार्थ भी समाप्त नहीं होता। जहाँ स्वार्थ समाप्त नहीं होता वहाँ मानवता किस प्रकार बन सकती है। मुहम्मद ने उन्हें एक ही पाठ पढ़ाया कि आज राष्ट्रीय बनो, नुम राष्ट्र की रक्षा करो। धर्म को उन्होंने व्यापक नहीं माना, राष्ट्र को व्यापक माना। राष्ट्र को व्यापक मानकर आज सीमा पर संग्राम हो रहा है उनके स्वरों में वहीं मुहम्मद का नाद। स्वार्थी व्यक्तियों ने नहीं जाना कि हमारा कर्तव्य क्या है, हमें क्या करना है कहाँ तो एक मानव नष्ट हो रहा है कहाँ एक भोेगविलास में लगा हुआ है एक माता के श्रृंगार को लूटा जा रहा है और एक माता भोग विलासों में मग्न है। आगे जो काल आया देखो, जब यहाँ यवन आये तो जैसे मुहम्मद ने अपने जीवन में 13 संस्कार कराये ऐसे ही इनकी विचारधारा वालों ने यहाँ आ करके जो कार्य किये उसने इस संसार को अधोगति में पहुँचा दिया। हमारी जो माताएँ थीं, भगिनियाँ थीं वह बड़ी विदुषी होती थींं। महान् सीता का आदर्श उनके समक्ष था परंतु विद्या लुप्त होने के नाते माताओं की विद्या समाप्त हो गई। महान् पुस्तकालय तो जैनियों के काल में ही समाप्त हो चुके थे। यवनों का काल आया तो विद्यालयों को और समाप्त कर दिया गया और समाज में अज्ञानता फैला दी। माताओं को बड़े-बड़े कष्ट देकर तथा उनके साथ महान् दुराचार कर इस संसार को अधोगति में पहुँचा दिया।
 



अगली कड़ी में - गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा नानक, महर्षि दयानंद

आपका
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

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